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Fact Check: हिमाचल में 50-60 रुपये में सेब बेच रहे हैं किसान, अडानी के नाम से फैलाया जा रहा मैसेज है गलत

सोशल मीडिया पर एक और मैसेज वायरल हो रहा है. इसमें दावा किया जा रहा है कि अडानी ग्रुप की नजर शिमला के सेबों पर पड़ गई है. इस वजह से अब वहां छोटे व्यापारी खत्म हो चुके हैं और किसान भी मजबूरी में अपने सेब 6 रुपये किलों के हिसाब से बेच रहे हैं.

कृषि कानून को लेकर किसान करीब दो माह से आंदोलन कर रहे हैं. 26 जनवरी यानी आज दिल्ली में हजारों किसानों ने ट्रैक्टर रैली भी निकाली. वे कृषि कानून वापस लेने की मांग पर अड़े हैं. गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में ट्रैक्टर रैली के दौरान किसानों और पुलिस में कई जगह झड़प भी हुई. नौबत आंसू गैस के गोलों और लाठीचार्ज की आ गई. किसान आंदोलन सोशल मीडिया पर भी काफी छाया हुआ है. इससे संबंधिम कई फर्जी पोस्ट का The News Postmortem खुलसा कर चुकी है. अब सोशल मीडिया पर एक और मैसेज वायरल हो रहा है. इसमें दावा किया जा रहा है कि अडानी ग्रुप की नजर शिमला के सेबों पर पड़ गई है. इस वजह से अब वहां छोटे व्यापारी खत्म हो चुके हैं और किसान भी मजबूरी में अपने सेब 6 रुपये किलों के हिसाब से बेच रहे हैं.

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व्हाट्सऐप पर वायरल मैसेज में लिखा है,
किसान आंदोलन क्यों कर रहे हैं, यह समझने के लिए शिमला आइये.
शिमला में सेब के बाग है और किसानों से छोटे छोटे व्यापारी सेब खरीदकर देश भर में भेजते थे. व्यापारियों के छोटे-छोटे गोदाम थे. अडानी की नजर इस कारोबार पर पड़ी. हिमाचल प्रदेश में भाजपा की सरकार है तो अडानी को वहां गोदाम बनाने के लिए जमीन लेने और बाकी कागजी कार्यवाही में कोई दिक्कत नहीं आई. अडानी ने वहां पर बड़े-बड़े गोदाम बनाए जो व्यापारियों के गोदाम से हजारों गुना बड़े थे.
अब अडानी ने सेब खरीदना शुरू किया, छोटे व्यापारी जो सेब किसानो से 20 रुपए किलो के भाव से खरीदते थे, अड़ानी ने वो सेब 22 रुपय किलो खरीदा. अगले साल अड़ानी ने रेट बढ़ाकर 23 रुपय किलो कर दिया. अब छोटे व्यापारी वहां खत्म हो गए. अडानी से कम्पीट करना किसी के बस का नहीं था. जब वहां अडानी का एकाधिकार हो गया तो तीसरे साल अड़ानी ने सेब का भाव 6 रुपय किलो कर दिया.
अब छोटा व्यापारी वहां बचा नहीं था, किसान की मजबूरी थी कि वो अडानी को 6 रुपये किलो में सेब बेचे. अब अडानी किसान से 6 रुपए किलो सेब खरीदता है और उस पर एक-दो पैसे का अडानी लिखा स्टिकर चिपका कर 100 रुपए किलो बेच रहा है. बताइए क्या अडानी ने वो सेब उगाए?
टेलिकॉम इंडस्ट्री की मिसाल भी आपके सामने हैं. पहले देश में 25 से ज्यादा मोबाइल सर्विस प्रवाइडर थे. जिओ ने शुरू के दो-तीन साल फ्री कॉलिंग, फ्री डेटा देकर सबको समाप्त कर दिया. आज केवल तीन सर्विस प्रवाइडर ही बचे हैं और बाकी दो भी अंतिम सांसंे गिन रहे हैं. अब जिओ ने रेट बढ़ा दिए. रिचार्ज पर महीना 24 दिन का कर दिया. पहले आपको फ्री और सस्ते की लत लगवाई अब जिओ अच्छे से आपकी जेब काट रहा है.
कृषि बिल अगर लागू हो गया तो गेहूं, चावल और दूसरे कृषि उत्पाद का भी यही होगा. पहले दाम घटाकर वो छोटे व्यापारियों को खत्म करेंगे और फिर मनमर्जी रेट पर किसान की उपज खरीदेंगे. जब उपज केवल अडानी जैसे लोगों के पास ही होगी तो मार्केट में इनका एकाधिकार और वर्चस्व होगा और बेचेंगे भी यह अपने रेट पर. अब सेब की महंगाई तो आप बर्दाश्त कर सकते हो क्योंकि उसको खाए बिना आपका काम चल सकता है लेकिन रोटी और चावल तो हर आदमी को चाहिए.
अभी भी वक्त है, जाग जाइए, किसान केवल अपनी नहीं आपकी और देश के 100 करोड़ से अधिक मध्यमवर्गीय परिवारों की भी लड़ाई लड़ रहा है, जो भी अंधभक्ति में डूबा हुआ व्यक्ति है और किसानों के साथ नहीं उसका सामाजिक बहिष्कार करो.
जो किसान की बात करेगा
अब वही देश पर राज करेगा.
जय हिन्द, जय भारत

हमने इस मैसेज की पड़ताल के लिए गूगल पर सर्च किया तो पता चला कि अडानी ग्रुप की फार्म पिक कंपनी सेबों को खबरीदती और बेचती है. Opindia के अनुसार, दिसंबर 2004 में फार्म पिक को ग्रुप में शामिल किया गया था. उस समय केंद्र में यूपीए यानी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी और प्रधानमंत्री थे मनमोहन सिंह. हिमाचल प्रदेश के रोहड़ू, सैंज और रेवली में कंपनी के कोल्ड स्टोरेज हैं. अडानी ग्रुप की वेबसाइड के मुताबिक, 15000 किसानों से कंपनी सेब खरीदती हैं. ये सेब 36 से ज्यादा शहरों में मिलते हैं. इसका मतलब यह है कि अडानी ग्रुप की फार्म पिक की स्थापना 16 साल पहले हो गई थी.

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न्यूज इन इंडिया लाइव के मुताबिक, करीब 15 साल से कंपनी किसानों से सेब खरीद रही है. हिमाचल प्रदेश में हर साल 2 से 3 करोड़ पेटी सेब का उत्पादन होता है. इसमें से भी केवल राॅयल सेब को ही अडानी की कंपनी खरीदती है. यह खरीद सालाना 15 से 18 लाख पेटी तक होती है. इस साल की बात करें तो अडानी ग्रुप ने 88 रुपये किलो के हिसाब से किसानों से सेब खरीदा है. इतना ही नहीं कंपनी ट्रांसपोर्टेशन का खर्चा भी चाुद ही उठाती है. साथ ही पेटी के लिए क्रेट भी उप्लब्ध कराती है. इससे किसान को इन सब झंझटों से छुटकारा मिल जाता है और आसानी से उसका सेब अच्छे रेट में बिक जाता है. इस सेब को दिसंबर से जून के बीच देश के कई हिस्सों में बेचा जाता है. 20 अगस्त के बाद कंपनी सेब की खरीदारी शुरू करती है. कंपनी ने वर्ष 2020 में 17 मीट्रिक टन सेब खरीदा है. इसकी पेमेंट भी किसानों को 10 दिन में हो जाती है.

adani apple story

इस बारे में हमने हिमाचल के जुब्बल के रहने वाले किसान पवन से बात की. उन्होंने कहा कि उनके करीब एक हजार पेड़ हैं. उन्होंने 1500-1600 रुपये प्रति पेटी के हिसाब से सीधे मंडी में अपना सेब बेचा है. एक पेटी में 25 से 28 किलो तक सेब आता है. इस हिसाब से देखा जाए ता एक किलो सेब की कीमत 50 से 60 रुपये के बीच पड़ी. 6 या 7 किलो में वह सेब बिकता है जो दबने के कारण सड़ जाता है या पेड़ से नीचे गिर जाता है. यह जूस या शराब बनाने के काम में आता है. उनके क्षेत्र का सेब एक्सपोर्ट किया जाता है. अडानी ग्रुप के कोल्ड स्टोरेज में सेब का स्टोरेज करके कई जगह बेचती है. सेब कम होने पर इस बार कुछ वैरायटी 3 हजार रुपये प्रति पेटी भी बिका है.

adani apple rate list 2020

अब बात करते हैं कि क्या अडानी ग्रुप ही हिमाचल में सेब खरीदती है. अगस्त 2020 में अमर उजाला में छपी खबर के मुताबिक, बिग बास्केट, वॉलमार्ट, अडानी, रिलायंस फ्रेश व सफल कंपनिया किसानों से सेब खरीद रही हैं. इससे बागवानों को काफी फायदा हो रहा है. क्वालिटी के हिसाब से किसानों को उनके सेब के दाम मिल रहे हैं. किसानों को उनका भुगतान भी एक हफ्ते में किया जा रहा है.

Postmortem रिपोर्टः अडानी एग्री फ्रेश लिमिटेड करीब 15 साल से हिमाचल में किसानों से सेब खरीद रही है. साथ ही वह सेब के अच्छे दाम भी दे रही है और पैकिंग व ट्रांस्पोर्टेशन का जिम्मा भी उठा रही है. किसान सीधे मंडी में भी 50 से 60 रुपये किलो में सेब बेच रहे हैं. 6 या 7 रुपये में सड़ा हुआ सेब बिकता है, जो शराब या जूस बनाने के काम में आता है.

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